कार्बन फुटप्रिंट क्या है? COP 15 और कार्बन फुटप्रिंट कम करने के लिए भारत की योजनाएँ

2/6/20261 min read

a large area of land with trees
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कार्बन फुटप्रिंट की परिभाषा

कार्बन फुटप्रिंट, जिसे हिंदी में कार्बन पदचिह्न कहा जाता है, से तात्पर्य उस कुल ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा से है जो किसी व्यक्ति, संगठन, गतिविधि या उत्पाद के निर्मित होने की प्रक्रिया में उत्पन्न होती है। इसमें मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के अलावा अन्य ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल होती हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन में योगदान करती हैं। इस प्रकार, कार्बन फुटप्रिंट केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह एक संकेतक है जो हमारे पर्यावरणीय प्रभाव को दर्शाता है।

कार्बन फुटप्रिंट को मापने के लिए विभिन्न विधियाँ अपनाई जाती हैं। सबसे सामान्य तरीका "कार्बन फुटप्रिंट कैलकुलेटर" का उपयोग करना है, जिसका उपयोग व्यक्ति या संगठन अपनी गतिविधियों से उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन का आकलन करने के लिए कर सकते हैं। यह कैलकुलेटर आमतौर पर ऊर्जा उपयोग, यात्रा संबंधी आदतों, खाद्य खपत और अन्य कारकों के आधार पर कार्य करता है। इसके परिणाम से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि हमें अपने कार्बन हस्ताक्षर को कम करने के लिए किन क्षेत्रों में सुधार करने की आवश्यकता है।

कार्बन फुटप्रिंट का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह हमारे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करता है। इससे हमें न केवल अपने व्यक्तिगत या संगठनात्मक योगदान को समझने में मदद मिलती है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन से लड़ने की दिशा में भी प्रेरित करता है। इसलिए, कार्बन फुटप्रिंट का अध्ययन और उसका मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है, ताकि हम एक स्थायी भविष्य की दिशा में कदम उठा सकें।

COP 15 का परिचय

COP 15, जिसे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के रूप में जाना जाता है, जलवायु परिवर्तन की समस्याओं का समाधान खोजने और वैश्विक स्तर पर एकजुटता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। यह सम्मेलन दिसंबर 2009 में कोपनहेगन, डेनमार्क में आयोजित हुआ था। COP का पूरा नाम "कॉन्फरेंस ऑफ द पार्टीज़" है और यह सम्मेलन द्वारा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ठोस प्रयासों की रूपरेखा तैयार की जाती है।

इस सम्मेलन का महत्त्व इस बात में निहित है कि यह वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति एक समर्पित प्रयास था। COP 15 का मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे खतरों का सामना करना और कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना है। इस सम्मेलन में सौ से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन पर एक सामान्य दिशा में कदम बढ़ाने का प्रयास किया।

कई विकासशील देशों के लिए, COP 15 अवसर प्रदान करता है ताकि वे दीर्घकालिक विकास रणनीतियों की योजना बना सकें। इस सम्मेलन में साझा दृष्टिकोण तैयार किए गए, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने में सहायता मिलेगी। इसके माध्यम से देशों के बीच सहमति स्थापित करने का प्रयास किया गया है, जिससे हर देश को अपने-अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम करने की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा सके। COP 15 की वार्ता ने कई नीतिगत रुझानों को प्रभावित किया जिसे आगे की जलवायु वार्ताओं में महत्व दिया गया है।

भारत का कार्बन फुटप्रिंट

भारत का कार्बन फुटप्रिंट विश्व में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है, विशेषकर ग्लोबल वार्मिग और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में। वर्तमान में, भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक है, जो वैश्विक उत्सर्जन का लगभग 7-8% हिस्सेदारी रखता है। वर्ष 2020 में, भारत ने 2,654 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन किया, जो उसके विकास पर निर्भरता दिखाता है।

भारत के कार्बन उत्सर्जन का मुख्य स्रोत ऊर्जा उत्पादन है, जहॉं कोयला सबसे बड़ा योगदान देता है। देश की लगभग 70% ऊर्जा कोयले से उत्पन्न होती है, जिससे उत्सर्जन में वृद्धि होती है। इसके अलावा, परिवहन क्षेत्र, औद्योगिक प्रक्रियाएँ और कृषि भी महत्वपूर्ण कार्बन फूटप्रिंट में योगदान करते हैं। जैसे-जैसे देश का औसत जीवन स्तर ऊँचा होता है, ऊर्जा की मांग में वृद्धि होती है, जिससे कुल उत्सर्जन में भी इजाफा होता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत का कार्बन फुटप्रिंट अन्य देशों के मुकाबले वृद्धि करने में लगा है। हालांकि, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए भारत ने कई कदम उठाए हैं। सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए नीतियाँ बनाई हैं, जैसे कि सौर और पवन ऊर्जा। भारत की योजना है कि वह 2030 तक 500 GW नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित करे, जिससे उसके कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में मदद मिलेगी।

भारत की कार्बन फुटप्रिंट कम करने की योजनाएँ

भारत के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए कई योजनाएँ और कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं। एक प्रमुख पहल भारत की ऊर्जा नीति के अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों का उपयोग बढ़ाना है। इस संदर्भ में, भारत ने 2022 तक 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया था, जिसमें सौर ऊर्जा सबसे बड़े योगदान में है। सौर पार्कों और सौर छत के स्थापित होने से इसे बेहतर तरीके से हासिल करने की दिशा में वृद्धि हुई है।

इसके अतिरिक्त, ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भारत सरकार ने "ऊर्जा दक्षता ब्यूरो" की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा का सर्वोत्तम उपयोग करना है। इस दिशा में, ऊर्जा आधारित उपकरणों की लागत को कम करके और उपयोगकर्ताओं को ऊर्जा के कुशल विकल्प उपलब्ध कराकर, ऊर्जा की खपत को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा रहा है।

पर्यावरणीय संरक्षण की योजनाएँ भी कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में सहायक हैं। "नमामि गंगा" जैसे कार्यक्रमों के जरिए जल bodies और जैव विविधता के संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके अलावा, वनों का संरक्षण और वृक्षारोपण भी प्रमुख हैं। भारत में वर्ष 2030 तक 33% वन क्षेत्र के संरक्षण का लक्ष्य है, जो कार्बन अवशोषण में मददगार साबित होगा। यह योजनाएँ देश के कार्बन फुटप्रिंट को नियंत्रित करने में मदद करने का संकल्प करती हैं, और उनकी स्थिरता और पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं।

COP 15 में भारत की भूमिका

COP 15, जिसे UNFCCC की जलवायु परिवर्तन की वार्षिक शिखर सम्मेलन के रूप में जाना जाता है, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है ताकि वह अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए अपनी योजनाओं और प्रतिबद्धताओं को प्रस्तुत कर सके। भारत ने इस सम्मेलन में सक्रिय भागीदारी दिखाई और विभिन्न स्थाई विकास लक्ष्यों की ओर अपने प्रयासों को विकसित करने का एक दृढ़ निश्चय दर्शाया। भारत ने जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया और विकासशील देशों की आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व किया।

भारत ने COP 15 में अपने नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विस्तार और कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए विभिन्न योजनाएँ प्रस्तुत की। इसके तहत, भारत ने 2030 तक अपने उत्सर्जन को 33-35% तक घटाने का लक्ष्य रखा, जो कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयासों का एक भाग है। भारत ने यह भी बताया कि वह नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाने और इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के लिए तैयार है। इस संदर्भ में, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से तकनीकी सहयोग की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।

भारत ने विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों पर विचार करने के लिए COP 15 में अपनी आवाज को मजबूती से प्रस्तुत किया। इस वार्ता में भारत ने जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और कार्यान्वयन क्षमता के सम्बन्ध में अपने दृष्टिकोण साझा किए। ये सभी पहलें न केवल भारत के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में सहायक सिद्ध होंगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रति सशक्त प्रतिक्रिया में भी योगदान करेंगी। इस तरह, COP 15 में भारत की भागीदारी ने उसके पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता और विकास के साथ संतुलन बनाने के प्रयासों को एक नई दिशा दी।

कार्बन फुटप्रिंट कम करने के लाभ

कार्बन फुटप्रिंट कम करने के लाभ विविध और महत्वपूर्ण हैं, जिनका प्रभाव न केवल पर्यावरण पर, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। सबसे पहले, जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों को कम करना एक प्राथमिक लाभ है। जब हम अपने कार्बन उत्सर्जन को घटाते हैं, तो इसका सीधा असर ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में कमी पर होता है। इससे ग्लोबल वार्मिंग की प्रक्रिया धीमी पड़ती है, जो अनेक प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन को रोकने में सहायक होती है।

दूसरा, कार्बन फुटप्रिंट के घटने से स्वास्थ्य में सुधार होता है। वायु प्रदूषण, जो मुख्य रूप से कार्बन उत्सर्जन से जुड़ा होता है, मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। जब हम प्रदूषण को कम करते हैं, तो रोगों की संख्या में भी कमी आती है। इससे लोगों की जीवन गुणवत्ता में सुधार होता है और स्वास्थ्य संबंधी खर्चों में भी कमी आती है।

तीसरा, आर्थिक लाभ भी कार्बन फुटप्रिंट को कम करने से जुड़े होते हैं। जब हम ऊर्जा की अधिक प्रभावी और सतत तरीकों का उपयोग करते हैं, तो यह दीर्घकालिक में बचत का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश से नई नौकरियों का सृजन होता है और आर्थिक विकास को गति मिलती है।

अंत में, सतत विकास के लिए पर्यावरण की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण लाभ है। जब हम अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम करते हैं, तो इससे हमारे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा होती है। यह सुनिश्चित करता है कि आने वाली पीढ़ियाँ भी एक स्वस्थ और संतुलित पर्यावरण का आनंद ले सकें। इस प्रकार, कार्बन फुटप्रिंट कम करने के प्रयास केवल एक पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

भविष्य की दिशा

कार्बन फुटप्रिंट को कम करने की दिशा में भारत के प्रयास महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के संदर्भ में। भारत ने COP 15 (क्लाइमेट चेंज कांफ्रेंस) में न केवल अपने नीतिगत लक्ष्यों को प्रस्तुत किया है, बल्कि इस दिशा में कई प्रमुख योजनाओं की भी घोषणा की है। इन योजनाओं का उद्देश्य उद्योग, परिवहन, और ऊर्जा उत्पादन में परिवर्तन लाना है, ताकि कार्बन उत्सर्जन को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सके। उदाहरण के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाने की पहल, जैसे सौर और पवन ऊर्जा, भारत के विकासात्मक दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भविष्य में, कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए कुछ प्रायोगिक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, सभी नागरिकों को इस दिशा में अपनी भूमिका समझनी और निभानी चाहिए। व्यक्तिगत स्तर पर छोटे-छोटे बदलाव, जैसे शहरी परिवहन के विकल्प चुनना, ऊर्जा की खपत को कम करना, और प्लास्टिक का उपयोग न्यूनतम करना, सामूहिक रूप से व्यापक असर डाल सकते हैं। सीखने और जागरूकता फैलाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत की जानी चाहिए, जिससे लोग अपनी जिम्मेदारियों को पहचान सकें।

इसके अलावा, सरकारी नीतियों में सुधार और कार्यान्वयन में और अधिक समन्वय की आवश्यकता है। यह जरूरी है कि सरकारी स्तर पर भी कार्बन फुटप्रिंट को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। यदि यह प्रयास निरंतर जारी रहे और सभी ठोस कदम उठाए जाएं, तो भारत अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सकता है। इस दिशा में एकीकृत और सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है, ताकि हम आने वाले वर्षों में एक स्थायी और स्वस्थ पर्यावरण की दिशा में बढ़ सकें।